अन्तर्राष्ट्रीय

बहिष्कार बेकार, 2021 में चीन से व्यापार 100 अरब डॉलर पार, ड्रैगन से क्यों व्यापार बढ़ा रही मोदी सरकार?

नई दिल्ली/बीजिंग, दिसंबर 27: भारत और चीन ने इस साल एक बड़ा मील का पत्थर हासिल किया जब भारत और चीन, दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार ने 100 बिलियन अमरीकी डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर लिया है। इतनी बड़ी व्यापारिक सफलता हासिल करने के बाद भी दोनों ही देशों की राजधानी में कोई व्यापारिक धूमधाम का आयोजन नहीं हुआ और ना ही दोनों ही देशों के बीच कोई जश्न मनाया गया और इसका कारण साफ है, दोनों एशियाई दिग्गज अपने संबंधों में बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं। लेकिन, सवाल ये है, कि आखिर चीन को लेकर भारत सरकार की पॉलिसी आगे भी यही रहने वाली है और सरहद पर तनाव के बाद भी व्यापारिक स्तर पर दोनों ही देश ऐसे ही नये रिकॉर्ड कामय करते रहेंगे?
2001 से 2021 तक का सफर


साल 2001 में जब भारत में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी, उस वक्त भारत और चीन के बीच का व्यापार महज 1.83 अरब डॉलर था और फिर दोनों ही देशों ने अपने द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने का फैसला किया और साल 2021 में दोनों ही देशों ने 100 अरब अमेरिकी डॉलर के मील के पत्थर को हासिल कर लिया, जो एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिल उपलब्धि है, जिसका बीजिंग ने स्वागत किया है।
संबंध खराब, व्यापार में गर्मजोशी?

दोनों ही देशों के संबंध एक तरफ जहां सीमा पर काफी खराब होते रहे हैं, तो व्यापार में दोनों ही देश काफी गर्मजोशी दिखा रहे हैं और जाहिर है, इससे दोनों ही देशों को लाभ भी मिल रहा है, लेकिन सवाल असल में ये उठता है, कि आखिर चीन को लेकर भारत सरकार की पॉलिसी आगे भी ऐसे ही चलने वाली है और एक तरफ जहां भारत चीन को घेरने के लिए क्वाड जैसे ग्रुपों में शामिल होता है, तो फिर दूसरी तरफ व्यापारिक भागीदारी बढ़ाना, क्या सचमुच इससे भारत- चीन समस्या का समाधान हो जाएगा?

सालाना व्यापार में 46 फीसदी बढ़ोतरी


चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स के पिछले महीने के आंकड़ों के मुताबिक, भारत और चीन के बीच का द्विपक्षीय व्यापार इस साल जनवरी से नवंबर के बीच 46.4 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हासिल की है और अब दोनों ही देशों का व्यापार बढ़कर 114.263 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है। चीन सरकार के इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय एक्सपोर्ट में 38.5 फीसदी की वृद्धि हुई है और अब भारत 26.358 अरब डॉलर का सामान चीन को भेजता है, जबकि भारतीय इम्पोर्ट में 49 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, यानि, भारत अब चीन से 87.905 अरब डॉलर का सामान मंगाता है। इन आंकड़ों से साफ तौर पर दो बातें समझने को मिल रही हैं। पहली बात ये, कि भारत सरकार की तरफ से चीन से व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की हरी झंडी है और दूसरी बात ये, कि भारत में रह-रहकर ‘चीनी सामानों के बहिष्कार’ की जो मुहिम चलाई जाती है, वो सिर्फ नाम का होता है।

भारत का व्यापार घाटा बढ़ा


एक तरफ भारत और चीन के बीच का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया है, लेकिन दूसरी तरफ भारत का चीन के साथ व्यापारिक घाटा और ज्यादा बढ़ गया है। पिछले 11 महीनों में भारत का व्यापारिक घाटा और ज्यादा बढ़ गया है। यानि, भारत का चीन के साथ एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट के बीच का फासला और ज्यादा बढ़ा है और ये वृद्धि 53.49 फीसदी है। यानि, भारत और चीन के बीच का व्यापारिक घाटा अब बढ़कर 61.547 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है। यानि, एक बात जो साफ तौर पर यहां जाहिर हो रही है, कि मेक इन इंडिया का चीन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है और इस साल भी भारत सरकार चीन में भारतीय सामान भेजने में कामयाब नहीं हो पाई है।

सीमा पर जारी है तनाव
पिछले साल जून महीने में गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक हुई थी, जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हो गये थे और उसके बाद से दोनों ही देशों के बीच का तनाव बढ़ा हुआ ही है। हालांकि, दोनों ही देशों के बीच सीमा पर तनाव कम करने के लिए कई राउंड की बैठक की गई है और कई क्षेत्रों से दोनों ही देशों की सेनाएं पीछे भी हटी हैं, लेकिन हकीकत ये है कि, सीमा पर अभी भी दोनों ही देशों के करीब 50 हजार से 60 हजार सैनिक तैनात हैं और दोनों ही देशों के बीच का विश्वास का रिश्ता बुरी तरह से डगमगाया हुआ है और सर्दी के इस महीने में, जब तापमान शून्य से 40 डिग्री से 50 डिग्री कम है, उस वक्त भी दोनों ही देशों के सैनिक सीमा पर टिके हुए हैं, लेकिन, इससे ये जाहिर होता है कि, सीमा पर तनाव का दोनों ही देशों के बीच के व्यापारिक रिश्ते पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है और दोनों ही देशों ने सरहद तनाव को आपसी व्यापार से पूरी तरह अलग रखा है, भले ही देश की एक बड़ी आबादी समझती हो, कि चीन से व्यापारिक संबंध भारत सरकार को खत्म कर देनी चाहिए।

विदेश मंत्री ने माना खराब संबंध
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने नवंबर में सिंगापुर में एक पैनल चर्चा के दौरान कहा था कि, भारत और चीन अपने संबंधों में ‘विशेष रूप से खराब पैच’ से गुजर रहे हैं क्योंकि बीजिंग ने समझौतों का उल्लंघन करते हुए कई कार्रवाईयां की है, जिसके बाद चीन के पास ‘विश्वसनीय व्याख्या’ करने वाले जवाब नहीं हैं। भारतीय विदेश मंत्री ने कहा था कि, ‘हम अपने रिश्ते में एक विशेष रूप से खराब पैच से गुजर रहे हैं क्योंकि उन्होंने (चीन) समझौतों के उल्लंघन में कार्रवाई का एक सेट किया है जिसके लिए उनके पास अभी भी एक विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं है।”

समझौतों का उल्लंघन करता चीन
इसके साथ ही भारतीय विदेश मंत्री ने साफ तौर पर पूर्वी लद्दाख में चीन की आक्रामकता की तरफ इशारा किया है और कहा है कि, चीन ने समझौतों का उल्लंघन किया है और चीन को जवाब देना है कि, उन्हें भारत के साथ रिश्ते को किस दिशा में ले जाना है। वहीं, पिछले महीने चीन में भारत के राजदूत विक्रम मिसरी के विदाई समारोह के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा था कि, चीन और भारत के बीच विशाल संभावनाओं पर चुनौतियां हावी हो गईं हैं, जिसमें भारतीय राजदूत ने चीन के लद्दाख में आक्रामकता की तरफ इशारा किया था।

बेनतीजा रहे शिखर सम्मेलन


साल 2018 के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच दो शिखर सम्मेलन हुए हैं, जिनमे व्यापारिक लक्ष्यों को पूरा करने के अलावा दोनों ही देशो के बीच उपजे सीमा विवाद को लेकर भी बात हुई है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2018 में वुहान का दौरा किया था, जहां उनकी शी जिनपिंग के साथ शिखर सम्मेलन हुआ था, जिसे पूरी दुनिया की मीडिया में काफी कलरेज मिला था, जबकि मोदी और शी जिनपिंग के बीच दूसरा शिखर सम्मेलन साल 2019 में चेन्नई में हुआ था, लेकिन अब साल 2021 में जब इन दोनों शिखर सम्मेलन की व्याख्या की जा रही है, तो पता चलता है कि, व्यापारिक संबंध बढ़ाने पर तो चीन ने काफी जोर दिया है, लेकिन सीमा पर चीन तनाव को बढ़ाता चला गया और ऐसा लग रहा है, कि भारत चीन की नियत को भांपने में फिर से गलती कर गया है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *