उत्तर प्रदेश

नीव की ईंट”- “पगला गयी हो अम्मा.. तीन ईंटों से घर बनता है कहीं!”

नीव की ईंट”-
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वह बूढ़ी औरत पसीने से तर-बतर थी। पर बूढ़ी हड्डियों में जोश और उत्साह देखते बनता था। सर पर तीन ईंटे तूली कपड़े में बांधकर लिये चली जा रही थी। शरीर धूल धूसरित..पर चेहरे पर उत्साही चमक..होंठो पर राम जी का गीत..”लल्ला मत हो और उदास,कि मैं आ रही महल बनवाने को..”

गीत गाते हुये उसकी नजरें रास्ते में नल तलाश रही थीं। शायद बूढ़ी अम्मा को प्यास लगी थी।तभी सड़क किनारे बसे एक गाँव में एक नीम के नीचे नल दिखा। वहीं कुछ औरतें नीम पर जल चढ़ा रही थीं। अम्मा ने ईंटों को साफ जगह रखा और नल से पानी पीने लगीं।‌ औरतें जल चढ़ाकर बूढ़ी मायी से पूंछ बैठीं-

“कहीं दूर से आ रही हो मायी..?”

“हां विटिया..! अयोध्या जा रही हूँ अपने लल्ला का घर बनवाने।”

औरतें हंसी- “पगला गयी हो अम्मा.. तीन ईंटों से घर बनता है कहीं!”

“तीन ईंटों से नही पर उत्साह से जरुर बनता है बेटा जी..अखबारों में पढ़ा नही , एक बड़े आभूषण निर्माता ने अयोध्या में राम लला के भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 34 किलो की चांदी की ईंटे मंदिर की नींव में लगने को दान की। ये उनकी मेरे लल्ला के प्रति मोहक उत्साह है।”

“मायी अभी जाना नही..थोड़ी देर सुस्ता लो..मैं आपके लिये सरबत ला रही हूँ।” उन औरतों में से एक बोली। बूढ़ी अम्मा बोलीं कुछ नही बस मुस्करा कर रह गयीं।

थोड़ी देर में खबर पूरे गाँव में फैल गयी थी कि ‘कोई बूढ़ी औरत राम मन्दिर के लिये ईंट लेकर जा रही है।’ कोई उन्हें खिलाने को फल लेकर दौड़ा ,कोई मिठाई.. देखते देखते भीड़ लग गयी।

उसी भीड़ से एक युवा जिसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी और थोड़ा गम्भीर दिख रहा था, आगे आकर बोला-

“मायी उस चांदी की ईंट का नीव में लग जाना कहां की बुद्धिमानी है? वह पैसा वे किसी हास्पिटल में लगा देते तो किसी का भला हो जाता।”

बूढ़ी मायी मुस्करायीं, बोलीं- “तुम क्या समझते हो उन्होंने नीव के लिये चांदी की ईंट देने के अतिरिक्त और कुछ नही किया..? उनके तमाम अनाथालय भी चल रहे हैं.. गरीबों के लिये हस्पताल भी खोल रखा है..बाकी यह ईंट उनकी लल्ला के प्रति आस्था है..जो उनका बेहद निजी मामला है..तुम्हारा कोई नुकसान तो चांदी की ईंट देने से हुआ नही.. राम मंदिर सिर्फ कोई इमारत भर नहीं बेटा, लाखों लाख सनातन धर्मियों की आस्था है जो आकार ले रही है अब।”

गाँव वाले मन्त्र मुग्ध हो बूढ़ी मायी को सुन रहे थे..जबकि मायी आगे बोलीं-

“लल्ला राम का ये मंदिर कलंकित इतिहास की छाती पर खड़ा स्वाभिमान, सनातन गौरव का प्रतीक होगा और इस गौरव को आने वाली तमाम पीढियां देखेंगी..सोचेंगी कि इसकी प्राप्ति को 500 साल का संघर्ष किया गया था। पिछले 30 साल से ज्यादा में तराशी गयी शिलाएं, ये ईंटें ये उस भव्य इमारत का भाग बनेंगी….. और फिर लल्ला के विराजते ही ये भव्य निर्माण देवत्व प्राप्त कर लेगा और उस देवत्व के भागीदार हो लेंगे तमाम वो लोग जो इसके होने का स्वप्न देखते थे..या देख रहे हैं..इतिहास बनने जा रहा है बेटा।”

मायी के चेहरे पर दर्प था। वाणी में जोश था। कहीं कोई थकान नही। पर वह लड़का उनके जोश को कम करके अपना बौद्धिक स्तर गाँव वालों को दिखाना चाहता था। हमारे यहाँ वामी होने का मतलब चेतना सम्पन्न होने का प्रमाण पत्र है। वह गाँव के लोगों को बताना चाहता था कि तुम सब मूर्ख हो जो इस बुढ़िया को सुन रहे हो। वह आगे बोला-

“लेकिन ये तो सिर्फ एक मंदिर का निर्माण भर होगा। एक मंदिर एक इमारत आप ईंट, पत्थर, और अन्य निर्माण सामग्रियों से बना सकते हो। नींव में चांदी सोने की ईंटे लगा सकते हो। किंतु इन निर्माण सामग्रियों से इतिहास नहीं बन सकता। मध्य युगीन इतिहास में एक परंपरा थी जब सामंत किले हवेलियां बनवाते उसकी नींव में निर्माणकार्य करने वाले मजदूर, कारीगरों में से किसी को जिंदा ही दफ़न कर दिया जाता था, तब जाकर इतिहास बनता था।” लड़के ने कुतर्क के माध्यम से व्यंग्य किया।

बूढ़ी मायी उसकी मूर्खता से आहत अवश्य हुयीं पर विना किसी आवेश के बोलीं-

“इन मानव हत्याओं से किले अजेय नहीं हुए बेटा जी..किलों को अजेय किया हज़ारों उन रणवीरों ने जो कभी खानवा तो कभी हल्दी घाटी में अपने रक्त से इतिहास की इबारत लिख गए..आयोध्या का ये ऐतिहासिक निर्माण भी ऐसे ही तमाम बलिदानों की नींव पर खड़ा हो इतिहास कहलायेगा। यहां नींव में है अशोक सिंघल का स्वप्न, यहां नींव में है लाल कृष्ण आडवाणी का संकल्प, यहां नींव में है कल्याण सिंह का दृणनिश्चय, यहां नींव में है नरसिम्हाराव का मौन, यहां नींव में है बाला साहिब की हिम्मत, यहां नींव में है अटल की वाणी का ओज, यहां नींव में है कोठारी बंधुओं जैसे कई बलिदानियों के बलिदान और यहाँ नींव में हैं कई पीढ़ियों के सतत संघर्ष..और इन सब नींव की ईंटो को संजोता है वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कौशल।इस इतिहास को बनते देखने का हमारा सौभाग्य है। ये मेरे लल्ला राम के पुनः अयोध्या आगमन सा ही अवसर है।”

बूढ़ी मायी की वाणी के ओज का ही कमाल था कि एक साथ बहुत सारी आवाजें आयीं-

“मायी , बस थोड़ी देर और रुक जाना हम भी तैयार होकर आ रहे हैं आपके साथ चलने आपके लल्ला का घर बनवाने के लिये।”

उस सामूहिक उद्घोष से वह इकलौती वामी की आवाज दब सी गयी। बूढ़ी मायी हीरो बनीं आगे चल रही थीं और उनके पीछे थी सनातनियों की एक लम्बी भीड़ जिनके सर पर ईंटे थीं और मन में उत्साह। बूढ़ी मायी ने फिर से अपना गीता प्रारंभ किया..बस इस बार गीत में “मैं” की जगह शब्द “हम” आ गया था “लल्ला मत हो और उदास कि हम आ रहे महल बनवाने को..”

राजेश ओझा

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